जुकाम कैसे ठीक करें।

देशी नुस्खे कितने कारगर सिद्ध होते हैं हमारे लिए ये हम तब समझे  जब मैं बीमार पड़ा और ठीक होने का नाम ही नहीं ले रहा था फिर गाँव  गया और वह की देशी नुस्खे मेरे लिए कारगर सिद्ध हुयी और मैं बिलकुल ठीक हो गया इसलिए अब जब मुझे दिल्ली में जुकाम बुखार होती तो मैं गाँव चला जाता और वह मेरी माँ देशी काढ़ा पिलाती और साथ में पपीता की पत्ती सुबह के समय पीस कर देती साथ में एक गिलास बकरी की दूध के साथ पीना होता था और मैं दो - तीन दिन में बिलकुल ठीक हो जाता था इससे मुझे केवल आराम ही नहीं मिलता था बल्कि मुझे अन्दर से ताक़त भी मिलती थी पर ध्यान रहे की पपीता की पत्ती का थोड़ा सा पार्ट पीस कर पीना होता है यदि इसकी मात्रा ज्यादा हो गयी तो हमें लूज मोशन हो जाती है और बकरी का दूध हमारे लिए फायदेमंद हैं ही। 

चलो जानने का प्रयास करते हैं की मेरी माँ क्या - क्या करती हैं जब मुझे जुकाम बुखार और खासी आती है सबसे पहले अलाव जला कर थोड़ा सा कड़वा तेल पैर के तलो में लगाकर सेकना होता है जिससे सिर और शरीर का तनाव कम हो जाता है ऐसा सुबह शाम दो - तीन दिन करने से बिल्कुल ठीक हो जाते हैं साथ में काढ़ा बनाती मिट्टी के मटके में उसमें आधा लीटर पानी के साथ जवाइन,अरूसा की पत्ती, थोड़ा सा नमक या लहटोरा की पत्ती का इस्तेमाल करते थी जो पीने में थोड़ा कड़वा  ज़रूर लगता है पर काफी आराम भी महसूस होता है साथ में हमारी इम्युनिटी भी मज़बूत होती है जुकाम भले ही एक नाजुक बीमारी लगती है लेकिन जब ये बिगड़ जाती है तो बहुत घातक सिद्ध हो जाती हैं इसलिए हमें इसको गंभीरता से लेनी चाहिए। 


इस समय मौसम बदल रहा हैं और ज्यादातर लोग जुकाम खासी बुखार से पीड़ित हो रहे हैं ज्यादातर लोगो को  देशी नुस्खे की सुविधा मिल नहीं पाती क्योंकि शहर में पपीता की पत्ती, बकरी का दूध मिल नहीं पाता है लेकिन दुकान पर पैकेट का काढ़ा मिल जाता है काफी लोग इसका प्रयोग करते है और काफी लोग देशी नुस्खे की कीमत भूलते जा रहे हैं क्योंकि 50 - 60 रूपये की दवा लेना सस्ता हो गया है जो हमारे लिए बहुत अच्छा तो नहीं लेकिन हमें तुरन्त आराम मिल जाता है इसलिए हम इसे लेना पसंद करते हैं। 

यदि हम बात करे शहर और गाँव  की तो गाँव में आज भी लोग देशी नुस्खे की काफी जानकारी रखते हैं यदि बुजुर्ग लोगो से इस बारे में बात करते हैं तो हमें बहुत कुछ सिखने को मिल जाता है लेकिन गाँव में भी अब काफी लोग देशी नुस्खे के बारे में भूलते चले जा रहे हैं और शहर में देशी नुस्खे बड़ी मुश्किल से ही मिल पाती हैं यदि हम संक्षिप्त में कहे तो आने वाले कुछ समय में हम अपने बुजुर्गों से देशी नुस्खे के बारे में सीख भी नहीं पाएंगे क्यूंकि आज के समय में बहुत कम लोग हैं जो बुजुर्गो के साथ बैठकर कुछ सिखने का प्रयास करते हैं जो उनकी अपने जीवन का अनुभव हैं वो हमसे छिनता चला जा रहा हैं। 

हमारे गाँव में जब लोगो को  जुकाम बुखार और खासी आती तो वे तुलसी की पत्ती खाते जिससे उनको खासी से राहत मिलती और जुकाम से राहत पाने के लिए सरपत की चाय बनाते ये एक अलग प्रकार का सरपत होती है जो लोग अपने घर चाय बनाने के लिए लगाते हैं जिसकी कारण  से चाय की स्वाद और खुशबू दोनों बढ़ जाती। कुछ लोग तो काली मिर्च, लौंग, इलायची की काली चाय बनाकर पीते है जिससे उनकी तनाव दूर होता और जुकाम से राहत मिलती है कुछ लोग तो जवाइन मुख में डालकर घंटो चूसते रहते हैं जिससे खासी नहीं आती। ये सब गाँव के देशी नुस्खे हैं जो हमारे जुकाम को ठीक करने के साथ - साथ हमारे शरीर के लिए भी फायदेमंद होते हैं। 

हमें ये तो समझना होगा की हमारे बुजुर्गो के पास देशी नुस्खे की अच्छी समझ थी जो आज हमें विज्ञान में प्रगति करने की प्रेरणा दी आज हम कितना भी प्रगति कर ले विज्ञान और दवाइयों में लेकिन कही न कही आज भी लोगो का विश्वास देशी नुस्खे के प्रति बना हुआ हैं जिससे लोग इस तरफ आकर्षित होते है।  भारत में आज भी पतंजलि , आयुर्वेद, झंडू , डाबर, तत्त्व जैसे देशी नुस्खे बड़े पैमाने पर भारत में अपना व्यवसाय कर रहे हैं और करोड़ो अरबो कमा रहे है ये चीजे प्रदर्शित करती हैं की आज भी लोग देशी नुस्खे को लेकर कितना गंभीर हैं क्योंकि जहाँ हमें एलोपैथिक दवाओं के लिए हजारो लाखो खर्च करने पड़ते हैं वही हमें देशी नुस्खे की दवायें फ्री में मिल जाती हैं और उनका लाभ भी हमारे शरीर के लिए काफी हैं। 







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