तराजू : कुछ तराजू को सही तरीके से बैलेंस करने में अधिकारी और न्यायलय को दुविधा क्यों होती है।
न्याय प्रणाली और दुविधा
यह विषय उन पाठकों को आकर्षित करेगा जो कानून , सामाजिक न्याय और निष्पक्षता में रूचि रखते है। आज मैं उन विषयों पर पर्दा उठाऊंगा जिन विषयों को लेकर हमारे समाज के प्रत्येक नागरिक के बीच यह दुविधा रहती है। कि क्या जब हम किसी विषय पर निष्पक्षता से न्याय की गुहार लगाते है प्रशासनिक पद्धति में , तो क्या हमें सही न्याय मिल पाती है। और इस दुविधा को लेकर हमारे अधिकारियों और न्यायलय के बीच क्या दुविधा रहती है।
मैंने सरकारी पद पर काम कर रहे अलग - अलग अधिकारियों से बात की चाहे वो पुलिस प्रशासन हो या फिर निम्नतम न्यायालय से लेकर उच्चतम न्यायालय के वकील हो। और मैं जानने का प्रयास किया की किस प्रकार ये पद्धति काम करती है। और किस प्रकार लोगो को न्याय मिलती है तो चलो जानने का प्रयास करते है।
लंबित मुकदमे
हम सभी जानते है कि सर्वोच्च अधिकारी यह सलाह देती है कि किस प्रकार सामाजिक पद्धति को चलाना हैं। और किस प्रकार लोगो को न्याय मिलना चाहिए। लेकिन यदि हम भारत जैसे देश के न्यायालय की बात करे तो लगभग 4.5 crore केस लंबित है निम्नतम न्यायालय में और लगभग 60000 से ज्यादा केस लंबित है उच्चतम न्यायालय में जो सिर्फ भारत के अमीर लोगो का केस है। यदि यही केस का समाधान करना आज से शुरू कर दे हमारा न्यायालय तो इस केस का समाधान करने में लगभग 300 साल लग सकते है। ये मैं नहीं बोल रहा बल्कि सरकारी डाटा बोल रही है।
आम आदमी और शुरुआती कठिनाइयां :
अब सवाल यह है कि आम व्यक्ति न्याय की गुहार कहा लगाता है और न्याय क्या सुनी जाती है। तो जवाब है हा लेकिन शुरुवात कहा से करनी पड़ती है सबसे पहले तो आम व्यक्ति अपनी गुहार पुलिस प्रशासन के पास या छोटे पायदानों पर करता जैसे लेखपाल, सेक्रेटरी और अन्य जगह। जबकि हमें पता है की आम आदमी को कुछ नहीं पता होता की सरकारी पद्धति किस प्रकार काम करती है पुलिस या अधिकारी जिस प्रकार से केस या FIR फाइल करते हैं उसी बेस पर आगे की कार्यवाही होती है।
मैंने कई अपर न्यायालय और IG, आईपीएस व जिला अधिकारी से बात की और जानने का प्रयास किया कि किस प्रकार यह पद्धति काम करती है उन्होंने ने जो मुझे बताया मैं हैरान रह गया। उन्होंने ने बताया बेटा जब कोई केस फाइल करता है तो ज्यादातर केसेस में उस व्यक्ति के पोते उस केस की समाप्ति का कारण बनते है मैंने पूछा सर ऐसा क्यूँ उन्होंने बताया बेटा केस ही इतनी लम्बी चलती है की समाप्त होने का नाम नहीं लेती। ज्यादातर केस में पुलिस प्रशासन और छोटे अधिकारियों की गलत तरीके से केस फाइल करने की वजह से होता है। और यही बेस से आगे की अधिकारी कार्यवाही करते है।
जहा तक रही आम आदमी के केस की वे केस लड़ ही नहीं पाते क्योंकि उनके पास पैसे की तंगी होती। और तो और वे छोटे - बड़े अधिकारी से बात करने में डरते है इसलिए तराजू का पाला भारी उस तरफ हो जो जो लगातार न्यायालय का चक्कर लगाता है। ज्यादातर केसेस में आम आदमी की हार ही होती है क्योंकि वह वकील को पैसे देने में असमर्थ होता है पुलिस को पैसे देने में असमर्थ होता है। इसलिए प्रशासनिक पद्धति जैसे चाहे वैसे केस को मोड़ दे देते है अगर कुछ अपवाद को छोड़ दे तो।

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